विटामिन डी की कमी: थकान, मनोभ्रंश और मस्तिष्क आयतन पर प्रभाव

द्वारा संपादित: Olga Samsonova

विटामिन डी, जिसे वैज्ञानिक रूप से एक प्रो-हार्मोन माना जाता है, शरीर की कई महत्वपूर्ण प्रणालियों, जिनमें अस्थि चयापचय, प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया और संज्ञानात्मक कार्य शामिल हैं, को गहराई से प्रभावित करता है। यह वसा-घुलनशील पोषक तत्व, जो सूर्य के प्रकाश के संपर्क में आने पर त्वचा में संश्लेषित होता है, सक्रिय होने के लिए यकृत और गुर्दे में दो हाइड्रॉक्सिलेशन अभिक्रियाओं से गुजरता है। विटामिन डी का सक्रिय रूप, कैल्सीट्राईऑल, शरीर में कैल्शियम और फास्फोरस के अवशोषण को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जो हड्डियों की मजबूती और मांसपेशियों के समुचित कार्य के लिए आवश्यक है।

हालिया शोध ने गंभीर विटामिन डी की कमी और विशेष रूप से वृद्ध महिलाओं में थकान की तीव्रता के बीच एक निर्णायक संबंध स्थापित किया है। यह कमी केवल ऊर्जा स्तर को ही प्रभावित नहीं करती, बल्कि यह आंतों की कार्यप्रणाली को भी बाधित करती है, जिससे आवश्यक कैल्शियम और फास्फोरस का अवशोषण बाधित होता है, जिसके परिणामस्वरूप मांसपेशियों में कमजोरी और दर्द की शिकायतें उत्पन्न होती हैं। चिकित्सकों द्वारा वयस्कों के लिए प्रतिदिन 1,000 से 2,000 अंतर्राष्ट्रीय यूनिट (IU) की इष्टतम सीमा बनाए रखने की सलाह दी जाती है, हालांकि रक्त परीक्षण के माध्यम से व्यक्तिगत स्थिति का निर्धारण सबसे विश्वसनीय मार्ग है। उभरते हुए डेटा विटामिन डी की भूमिका को बालों के विकास के नियमन और मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी उजागर करते हैं, जहां निम्न स्तर को अक्सर मनोदशा में बदलाव और अवसाद की भावनाओं से जोड़ा गया है।

भारत जैसे देश में, जहां धूप की प्रचुरता है, फिर भी लगभग 65 से 70 प्रतिशत आबादी किसी न किसी स्तर की कमी से प्रभावित है, जो शहरीकरण और घर के अंदर अधिक समय बिताने जैसी जीवनशैली कारकों को दर्शाता है। सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्षों में से एक यह है कि गंभीर विटामिन डी की कमी का संबंध मनोभ्रंश (डिमेंशिया) के बढ़े हुए जोखिम और मस्तिष्क के आयतन में कमी से है। कुछ अध्ययनों से पता चलता है कि यदि सामान्य विटामिन डी की स्थिति सुनिश्चित की जाए, तो कुछ आबादी में डिमेंशिया के मामलों का 17 प्रतिशत तक निवारण संभव हो सकता है। जर्मनी में बुजुर्गों पर किए गए एक अध्ययन में, 25 नैनोमोल्स प्रति लीटर (एनएमओएल/एल) से कम विटामिन डी स्तर वाले प्रतिभागियों में डिमेंशिया के लक्षण अधिक देखे गए थे, जो मस्तिष्क के ऑक्सीडेटिव तनाव को कम करने में विटामिन डी की न्यूरोप्रोटेक्टिव भूमिका को रेखांकित करता है।

विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते हैं कि उच्च खुराक का स्व-प्रशासन जोखिम भरा हो सकता है, क्योंकि इससे कैल्शियम का स्तर बढ़ सकता है, जिससे गुर्दे और हृदय संबंधी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। रक्त परीक्षण के माध्यम से सटीक स्थिति का पता लगाना और फिर डॉक्टर की सलाह पर ही पूरक आहार लेना महत्वपूर्ण है। विटामिन डी, जो प्रतिरक्षा प्रणाली की टी-कोशिकाओं को सक्रिय करने के लिए भी आवश्यक है, हृदय रोगों और चयापचय सिंड्रोम से भी जुड़ा हुआ है, जिससे इसकी पर्याप्त मात्रा बनाए रखने का महत्व समग्र स्वास्थ्य के लिए और भी बढ़ जाता है।

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स्रोतों

  • Internewscast Journal

  • University of South Australia

  • The London Osteoporosis Clinic Editorial Team

  • MedPodLA - Daniel, Ghiyam MD - Beverly HIlls CA 90210 - A4M

  • Dr. Raj Dasgupta (2026) - Sleep Advisor

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