वैश्विक दीर्घायु में अंतर: जीवन प्रत्याशा बनाम स्वस्थ जीवन प्रत्याशा
द्वारा संपादित: Olga Samsonova
वैश्विक स्तर पर जीवन प्रत्याशा में वृद्धि एक महत्वपूर्ण जनसांख्यिकीय परिवर्तन को दर्शाती है, जहाँ अधिकांश व्यक्ति अब 60 वर्ष की आयु पार कर रहे हैं। हालाँकि, यह बढ़ी हुई जीवन अवधि सार्वभौमिक रूप से बेहतर स्वास्थ्य गुणवत्ता के साथ नहीं जुड़ी है, जिसके परिणामस्वरूप जीवन प्रत्याशा और स्वस्थ जीवन प्रत्याशा के बीच एक स्पष्ट खाई बन गई है। यह विसंगति इस बात पर प्रकाश डालती है कि केवल अधिक वर्ष जीना ही पर्याप्त नहीं है; उन अतिरिक्त वर्षों में जीवन की गुणवत्ता बनाए रखना आवश्यक है।
वर्ष 2050 तक, अनुमान है कि 60 वर्ष से अधिक आयु के दो-तिहाई लोग निम्न और मध्यम आय वाले राष्ट्रों में निवास करेंगे, जो उम्र बढ़ने के अनुभवों में गहरे सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को उजागर करता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने इस चुनौती का मुकाबला करने और सहायक समुदायों को बढ़ावा देने के लिए 2021 से 2030 तक को 'स्वस्थ उम्र बढ़ने का दशक' घोषित किया है। इस दशक का उद्देश्य केवल जीवन में वर्ष जोड़ना नहीं है, बल्कि वर्षों में जीवन जोड़ना है, जिसके लिए एकीकृत देखभाल सेवाओं और दीर्घकालिक देखभाल तक पहुंच सुनिश्चित करने की आवश्यकता है।
जैविक दृष्टिकोण से, उम्र बढ़ना कोशिकाओं और अणुओं की प्रगतिशील क्षति के रूप में परिभाषित किया गया है, जो शारीरिक और मानसिक क्षमताओं को कम करता है। हालाँकि, सार्वजनिक नीतियां, जैसे कि आवास की सुगमता, परिवहन की उपलब्धता, और संतुलित आहार तथा शारीरिक गतिविधि जैसी स्वस्थ आदतें, वृद्ध अवस्था में जीवन की गुणवत्ता को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की पहली प्रगति रिपोर्ट, जो 136 देशों के सर्वेक्षण पर आधारित थी, ने उम्रवाद के खिलाफ राष्ट्रीय कानूनों में प्रगति दिखाई, लेकिन यह भी जोर दिया कि एक तिहाई से भी कम देशों के पास दशक के प्रमुख कार्रवाई क्षेत्रों के लिए पर्याप्त संसाधन हैं।
अंतर्राष्ट्रीय मंच, जैसे कि मैड्रिड में आयोजित बैठकें, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और जैव प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में हो रहे नवाचारों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं ताकि अतिरिक्त वर्षों को सार्थक जीवन में बदला जा सके। जैव प्रौद्योगिकी में प्रगति डीएनए क्षति और कोशिका क्षय जैसे उम्र बढ़ने के मूल कारणों को कोशिकीय स्तर पर लक्षित करने की क्षमता रखती है, जिसमें सेनोलिटिक्स और जीन संपादन जैसी तकनीकें शामिल हैं। यह समन्वित वैश्विक कार्रवाई, जिसमें नीति निर्माताओं, निजी क्षेत्र और नागरिक समाज की भागीदारी शामिल है, का लक्ष्य 2030 के सतत विकास लक्ष्यों के अनुरूप एक ऐसा विश्व बनाना है जहाँ कोई भी पीछे न छूटे।
जनसांख्यिकीय बदलावों के बावजूद, स्वास्थ्य सुविधाओं की गुणवत्ता और स्वच्छता जैसे कारक स्वस्थ जीवन प्रत्याशा (HALE) को प्रभावित करते हैं, जैसा कि मेडिगो के एक अध्ययन से पता चलता है, जो पारंपरिक डब्ल्यूएचओ माप से परे जाकर 'खराब स्वास्थ्य वाले वर्षों' पर भी विचार करता है। भारत जैसे देशों में, जहाँ 2050 तक अनुमानित 19.5 प्रतिशत आबादी वरिष्ठ नागरिक होगी, नीति आयोग ने प्रौद्योगिकी और एआई के उपयोग को प्राथमिकता देने का सुझाव दिया है ताकि देखभाल और वित्तीय सशक्तिकरण की बढ़ती मांगों को पूरा किया जा सके। यह स्पष्ट है कि दीर्घायु की चुनौती केवल चिकित्सा विज्ञान की नहीं, बल्कि सामाजिक संरचनाओं, पर्यावरणीय कारकों और नीतिगत प्रतिबद्धताओं के एक जटिल अंतर्संबंध की है, जिसके लिए निरंतर और केंद्रित प्रयास आवश्यक हैं।
1 दृश्य
स्रोतों
Público.es
CENIE
OMS
Diario Público
OMS
Infobae
इस विषय पर और अधिक समाचार पढ़ें:
क्या आपने कोई गलती या अशुद्धि पाई?हम जल्द ही आपकी टिप्पणियों पर विचार करेंगे।



