वर्ष 2025 तक जटिल डिजिटल परिदृश्य में बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए शिक्षा के महत्वपूर्ण चरणों को रेखांकित किया गया है, जिसमें मूलभूत सामाजिक-भावनात्मक क्षमताओं पर जोर दिया गया है। इंडोनेशिया विश्वविद्यालय के अनुप्रयुक्त मनोविज्ञान संस्थान (LPT UI) में कार्यरत बाल और किशोर मनोवैज्ञानिक, वीरा इताबिलियाना हदीविद्जोद्जो, एस.पीएसआई., एम.पीएसआई., इस शैक्षिक दृष्टिकोण की वकालत करती हैं। यह दृष्टिकोण मानता है कि बच्चे के स्वस्थ डिजिटल जुड़ाव की तैयारी के लिए प्रारंभिक वर्षों में ही नींव रखी जानी चाहिए।
बाल विकास के पहले पाँच वर्षों को 'पूर्व-डिजिटल कौशल' के निर्माण के लिए निर्णायक अवधि के रूप में पहचाना गया है, जिसमें भावना प्रबंधन और आत्म-नियमन जैसी मौलिक क्षमताएं शामिल हैं। अनुसंधान इंगित करता है कि आत्म-नियमन की क्षमता लगभग तीन वर्ष की आयु से उभरना शुरू हो जाती है, और तीन से पाँच वर्ष की आयु के बीच इसमें चरम वृद्धि देखी जाती है, जो जीवन भर के परिणामों को प्रभावित करती है। ये आधारभूत कौशल ही निर्धारित करते हैं कि कोई बच्चा डिजिटल क्षेत्र में कितनी स्वस्थ भागीदारी के लिए तैयार है, क्योंकि ये कौशल तनावपूर्ण परिस्थितियों से निपटने और आवेगों को नियंत्रित करने की क्षमता प्रदान करते हैं।
मनोवैज्ञानिक वीरा इताबिलियाना इस बात पर ज़ोर देती हैं कि इस प्रारंभिक चरण के दौरान गैजेट के उपयोग के संबंध में माता-पिता का व्यवहार बच्चों के दैनिक अनुकरण के लिए प्राथमिक मॉडल के रूप में कार्य करता है। माता-पिता को अपने बच्चे के लिए आत्म-नियंत्रण का उदाहरण बनना चाहिए, जिससे बच्चों में मीडिया साक्षरता बढ़ती है और गलत जानकारी साझा करने का खतरा कम होता है। लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के एक शोध पत्र के अनुसार, माता-पिता का जोखिम का अंदाज़ा और डिजिटल कौशल बच्चों के ऑनलाइन व्यवहार को नियंत्रित करने के तरीके को बहुत प्रभावित करते हैं। यह अवधारणा इस बात पर प्रकाश डालती है कि माता-सामने की बातचीत और वास्तविक जीवन के उदाहरणों के माध्यम से निर्मित एक सुदृढ़ भावनात्मक और व्यवहारिक आधार बच्चे की प्रारंभिक सुरक्षा कवच बनता है।
सामाजिक और भावनात्मक शिक्षा (SEL) आत्म-जागरूकता, आत्म-नियमन और सहानुभूति विकसित करने में सहायता करती है, जिससे चिंता और अवसाद कम होता है। जैसे-जैसे 2025 तक प्रौद्योगिकी जीवन में और अधिक एकीकृत होती जाएगी, प्रारंभिक डिजिटल जोखिम के नकारात्मक परिणामों से बचने के लिए इन बुनियादी सामाजिक-भावनात्मक दक्षताओं पर जोर देना उत्तरोत्तर महत्वपूर्ण होता जा रहा है।
डिजिटल युग में बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंताओं के बीच, भारत सरकार ने भी डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण नियमों, 2025 का मसौदा जारी किया है, जिसके तहत 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों को सोशल मीडिया अकाउंट खोलने के लिए माता-पिता की अनुमति लेना अनिवार्य होगा। यह नियामक कदम माता-पिता की भूमिका को महत्वपूर्ण बनाता है, जो बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर निगरानी रखने में सहायक होगा और यह सुनिश्चित करेगा कि बच्चे जिम्मेदारी और सुरक्षा के साथ डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग करें। यह व्यापक दृष्टिकोण, जिसमें शिक्षा और नियामक हस्तक्षेप दोनों शामिल हैं, 2025 की समय सीमा के लिए बच्चों की डिजिटल भलाई को सुरक्षित करने की दिशा में एक बहुआयामी प्रयास को दर्शाता है।




