छात्र कल्याण को आधार बनाकर प्रगतिशील शिक्षा की ओर रणनीतिक बदलाव
द्वारा संपादित: Olga Samsonova
वर्ष 2026 तक, शिक्षा प्रणाली में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक बदलाव की आवश्यकता है, जिसका मुख्य केंद्र प्रदर्शन-उन्मुख शैक्षणिक मॉडलों और डिजिटल अति-संपर्क से उत्पन्न होने वाले छात्रों के बढ़ते मानसिक स्वास्थ्य संकटों को संबोधित करना है। यह परिवर्तन छात्र कल्याण को गहन और स्थायी शिक्षा के लिए मूलभूत संज्ञानात्मक आधारभूत संरचना के रूप में प्राथमिकता देगा। चिंता और दीर्घकालिक तनाव जैसी मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताएँ अब सभी शैक्षिक स्तरों पर शिक्षार्थियों को प्रभावित कर रही हैं, जिसके कारण शैक्षणिक संस्थानों को अपनी सहायता सेवाओं का विस्तार करने के लिए प्रेरित होना पड़ रहा है।
यह दृष्टिकोण अंतर्राष्ट्रीय निकायों के विचारों के अनुरूप है। यूनेस्को ने स्पष्ट किया है कि मनोवैज्ञानिक कल्याण केवल एक सहायक कारक नहीं, बल्कि सीखने के लिए एक सक्षम शर्त है। इसके अतिरिक्त, आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD) का लर्निंग कम्पास 2030 ढाँचा सफलता के मापदंडों को केवल प्रदर्शन से परे परिभाषित करते हुए, शिक्षा को 'छात्र कल्याण' की अवधारणा के केंद्र में रखने का प्रस्ताव करता है। दीर्घकालिक तनाव का सीधा नकारात्मक प्रभाव कार्यशील स्मृति और एकाग्रता जैसे मुख्य संज्ञानात्मक कार्यों पर पड़ता है, जिससे छात्रों की दीर्घकालिक सीखने की क्षमता बाधित होती है।
इस संदर्भ में, शिक्षा मंत्रालय ने देश भर के स्कूलों के लिए एक समान मानसिक स्वास्थ्य सहायता नीति बनाने की तैयारी शुरू कर दी है, जिसका उद्देश्य डर और तनाव के कारण छात्रों में अवसाद और आत्महत्या के विचारों की रोकथाम करना है। यह नीति शिक्षा के अधिकार (आरटीई) अधिनियम की तरह ही सभी संस्थानों के लिए बाध्यकारी होगी, जिसके तहत सभी स्कूलों में प्रधानाचार्य, शिक्षक, अभिभावक और काउंसलर को मिलाकर एक मानसिक स्वास्थ्य समिति का गठन अनिवार्य होगा। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने भी 19 जनवरी, 2026 को एक परिपत्र जारी कर सभी संबद्ध स्कूलों में सामाजिक-भावनात्मक और करियर परामर्शदाताओं की नियुक्ति को अनिवार्य कर दिया है। यह कदम जुलाई 2025 में कोटा के एक वकील द्वारा दायर जनहित याचिका के बाद उठाया गया है।
CBSE के नए नियमों के अनुसार, अब हर 500 छात्रों पर कम से कम एक मानसिक स्वास्थ्य और करियर काउंसलर नियुक्त किया जाएगा, और छोटे स्कूलों की सहायता के लिए 'हब और स्पोक मॉडल' शुरू किया गया है। सामाजिक-भावनात्मक शिक्षा (SEL) पर किए गए मेटा-विश्लेषण, जैसे कि डर्लाक और सहयोगियों द्वारा किए गए शोध, इस बात की पुष्टि करते हैं कि SEL कौशल को पाठ्यक्रम में एकीकृत करने से अकादमिक प्रदर्शन के साथ-साथ सामाजिक-भावनात्मक क्षमताओं में भी सुधार होता है।
न्यायिक हस्तक्षेपों ने भी इस दिशा को बल दिया है। उदाहरण के लिए, पायल तडवी-रोहित वेमुला याचिका के बाद, न्यायालय ने विश्वविद्यालयों में भेदभाव और मानसिक स्वास्थ्य संकटों से निपटने के लिए एक मजबूत संस्थागत ढांचे की न्यायिक स्वीकृति दी थी, जिसमें जाति-संवेदनशील मानसिक स्वास्थ्य काउंसलिंग को भी शामिल किया गया था। यह समग्र दृष्टिकोण, जो जॉन डीवी द्वारा प्रस्तावित प्रगतिशील शिक्षा के सिद्धांतों पर आधारित है, रटंत ज्ञान के विपरीत, सक्रिय अधिगम, समस्या-समाधान और आलोचनात्मक चिंतन पर जोर देता है। यह बदलाव शिक्षा को केवल अकादमिक उपलब्धि तक सीमित न रखकर, छात्रों के पूर्ण मानसिक और सामाजिक क्षेम पर केंद्रित करता है, जैसा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) भी स्वास्थ्य को पूर्ण शारीरिक, मानसिक और सामाजिक कल्याण के रूप में परिभाषित करता है।
इसके अतिरिक्त, 2026 में शिक्षा जगत में अन्य बड़े बदलावों पर भी नजर रहेगी, जैसे कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुसार छात्रों के तनाव को कम करने के उद्देश्य से 10वीं कक्षा में दो बार बोर्ड परीक्षा का प्रयोग।
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स्रोतों
Agenda Digitale
UNESCO
PubMed
OECD
ResearchGate
OECD
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