मंगल ग्रह के सुदूर अतीत में एक विशाल जलराशि के अस्तित्व की परिकल्पना को हालिया भू-आकृति विज्ञान संबंधी साक्ष्यों ने और अधिक मजबूती प्रदान की है। यह शोध संकेत देता है कि लाल ग्रह कभी पृथ्वी के समान एक नीला ग्रह हो सकता था, जिसमें जीवन को आश्रय देने की क्षमता थी। यह महत्वपूर्ण अध्ययन प्रतिष्ठित पत्रिका 'npj Space Exploration' के जनवरी 2026 के अंक में प्रकाशित हुआ, जिसने ग्रह के उत्तरी गोलार्ध के एक बड़े हिस्से को ढकने वाले प्राचीन महासागर के विचार का समर्थन किया है।
अध्ययन का केंद्र सौरमंडल की सबसे बड़ी विदर प्रणाली, वैलेस मेरिनेरिस के भीतर स्थित कोप्राटेस चास्मा क्षेत्र था। शोधकर्ताओं ने इस क्षेत्र में 'स्कैर्प-फ्रंटेड डिपॉजिट्स' (SFD) की पहचान की, जिनकी व्याख्या प्राचीन नदी डेल्टा निक्षेपों के रूप में की गई है। ये संरचनाएं एक सुसंगत ऊंचाई सीमा पर पाई गईं, जिसका अनुमान -3750 मीटर से -3650 मीटर के बीच लगाया गया है। यह सीमा एक स्थिर जलस्तर का स्पष्ट संकेत देती है, जो अल्पकालिक बाढ़ के बजाय एक दीर्घकालिक महासागरीय प्रणाली की ओर इशारा करती है।
इस अनुसंधान में बर्न विश्वविद्यालय के पीएचडी छात्र इग्नेशियस अर्गाडेस्ट्या और इटालियन नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर एस्ट्रोफिजिक्स (INAF) के पादुआ एस्ट्रोनॉमिकल ऑब्जर्वेटरी के वैज्ञानिकों ने यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) के एक्सोमार्स ट्रेस गैस ऑर्बिटर (CaSSIS) और नासा के मार्स एक्सप्रेस तथा मार्स रिकोनिसेंस ऑर्बिटर से प्राप्त उच्च-रिज़ॉल्यूशन कक्षीय डेटा का उपयोग किया। इन उपकरणों ने सतह की स्थलाकृति का विस्तृत मानचित्रण संभव बनाया, जिससे डेल्टा-जैसी आकृतियों की ज्यामिति और ऊंचाई का सटीक आकलन किया जा सका।
अर्गाडेस्ट्या ने निष्कर्ष निकाला कि यह खोज उत्तरी गोलार्ध में फैले एक महासागर के प्रमाण प्रस्तुत करती है, जिसका अर्थ है कि पहले की तुलना में अधिक समय तक संभावित रूप से रहने योग्य सतह की स्थितियाँ मौजूद थीं। यह प्राचीन महासागर पृथ्वी के आर्कटिक महासागर के आकार के बराबर होने का अनुमान है और यह लगभग तीन अरब वर्ष पहले अस्तित्व में था। बर्न विश्वविद्यालय के प्रोफेसर फ्रिट्ज़ श्लुनेगर ने इन संरचनाओं को पृथ्वी पर देखे जाने वाले क्लासिक डेल्टा के समान बताया, जो इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि ये संरचनाएं स्थिर जलराशि के किनारे बनी थीं।
इस खोज का एक निहितार्थ यह है कि मंगल ग्रह पर पानी केवल अलग-थलग झीलों के रूप में नहीं, बल्कि विशाल दूरियों तक फैले जुड़े हुए प्रणालियों के रूप में मौजूद हो सकता था। यह भूवैज्ञानिक साक्ष्य, जैसे कि जीवाश्मयुक्त कीचड़ दरारें और प्राचीन टीलों की खोज, जो पानी के वाष्पीकरण का संकेत देते हैं, मंगल ग्रह के जलीय अतीत की कहानी को और अधिक विस्तृत करते हैं। यह अध्ययन उन जलवायु मॉडलों के परीक्षण में भी सहायता करता है जो यह समझाने का प्रयास करते हैं कि मंगल ग्रह बड़े पैमाने पर पानी को कैसे बनाए रख सकता था और फिर उसे खो दिया।
डेल्टा क्षेत्र विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे प्राचीन पर्यावरणीय इतिहास को संरक्षित करने वाले महीन तलछट और स्तरित निक्षेपों को रोक सकते हैं, जिससे भविष्य के मिशनों के लिए संभावित लैंडिंग साइटों का चयन प्रभावित हो सकता है। यह निष्कर्ष इस बात पर प्रकाश डालता है कि किसी ग्रह पर सतह पर पानी की उपलब्धता पहले के अनुमानों की तुलना में अधिक समय तक बनी रही, जो ग्रह की प्रारंभिक रहने की क्षमता की अवधि को बढ़ाता है। यह अध्ययन तुलनात्मक ग्रह विज्ञान के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदर्भ प्रदान करता है, जो दर्शाता है कि ग्रह कैसे आर्द्र से शुष्क अवस्था में परिवर्तित हो सकते हैं।

