मोल्दोवा ने आधिकारिक तौर पर सीआईएस से बाहर निकलने की प्रक्रिया पूरी की, यूरोपीय संघ की ओर भू-राजनीतिक झुकाव किया मजबूत

द्वारा संपादित: Tatyana Hurynovich

2 अप्रैल, 2026 को, मोल्दोवा गणराज्य की संसद ने आधिकारिक तौर पर स्वतंत्र राज्यों के राष्ट्रमंडल (सीआईएस) से देश के बाहर निकलने के निर्णय पर अपनी अंतिम मुहर लगा दी। विदेश मंत्रालय द्वारा पेश किया गया यह प्रस्ताव चिसीनाउ के उस रणनीतिक लक्ष्य की कानूनी परिणति है, जिसके तहत वह खुद को सोवियत प्रभाव से दूर कर यूरोपीय संघ (ईयू) के करीब ले जाना चाहता है। यह कदम क्षेत्र की बदलती भू-राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है।

इस निर्णय को राष्ट्रपति मैया सैंडू द्वारा उन फरमानों की घोषणा के साथ मजबूती मिली, जो 1991 के सीआईएस स्थापना समझौते, इसके प्रोटोकॉल और 1993 के सीआईएस चार्टर जैसे बुनियादी दस्तावेजों को रद्द करते हैं। इन दस्तावेजों का निरस्तीकरण 8 अप्रैल, 2026 को आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशन के साथ ही प्रभावी हो गया। मोल्दोवा के विधायी सदन में इस ऐतिहासिक बदलाव को जबरदस्त समर्थन मिला, जहां 60 सांसदों ने सर्वसम्मति से इसके पक्ष में मतदान किया। राष्ट्रपति सैंडू 2020 में अपने चुनाव के बाद से ही सीआईएस संरचनाओं से दूरी बनाए रखने की नीति पर चल रही हैं, और 2026 की शुरुआत तक उन्होंने संगठन से जुड़े 283 समझौतों में से 71 को पहले ही निरस्त कर दिया था।

चिसीनाउ के अधिकारियों के अनुसार, यह निर्णय उनके यूरोपीय मार्ग का एक अनिवार्य हिस्सा है, खासकर यूक्रेन पर रूस के चल रहे आक्रमण और मोल्दोवा के अपने क्षेत्र ट्रांसनिस्ट्रिया में रूसी सैन्य बलों की निरंतर मौजूदगी को देखते हुए। सरकार का तर्क है कि रूसी संघ ने सीआईएस के बुनियादी सिद्धांतों, विशेष रूप से सदस्य देशों की क्षेत्रीय अखंडता और सीमाओं के सम्मान के वादे का बार-बार उल्लंघन किया है।

आर्थिक दृष्टिकोण से भी यह अलगाव काफी तर्कसंगत दिखाई देता है। 2025 के व्यापारिक आंकड़ों के मुताबिक, मोल्दोवा के कुल निर्यात में सीआईएस देशों की भागीदारी घटकर मात्र 5.9% रह गई थी, जबकि इसके विपरीत यूरोपीय संघ ने देश के कुल निर्यात का 67.5% हिस्सा प्राप्त किया। इसके अतिरिक्त, सीआईएस की सदस्यता छोड़ने से देश को सालाना लगभग 3.1 मिलियन मोल्दोवन ल्यू (लगभग 185,000 अमेरिकी डॉलर) के सदस्यता शुल्क की बचत होगी, जिसे अब अन्य विकास कार्यों में लगाया जा सकता है।

हालांकि, इस कदम पर देश के भीतर राजनीतिक मतभेद भी दिखाई दिए। कम्युनिस्ट पार्टी सहित विपक्षी समूहों ने इसे आर्थिक रूप से विनाशकारी कदम बताया है, उनका तर्क है कि इससे महत्वपूर्ण निर्यात बाजार और विदेशों में काम कर रहे मोल्दोवन नागरिकों द्वारा भेजे जाने वाले धन पर बुरा असर पड़ेगा। दूसरी ओर, यूक्रेन ने इस साहसी निर्णय की प्रशंसा की और इसे संप्रभुता और यूरोपीय मूल्यों के प्रति मोल्दोवा की प्रतिबद्धता का प्रतीक बताया। यह घटनाक्रम ऐसे समय में आया है जब मोल्दोवा ने हाल ही में काउंसिल ऑफ यूरोप की मंत्रिपरिषद की अपनी अध्यक्षता सफलतापूर्वक पूरी की है।

मोल्दोवा के हटने के बाद अब सीआईएस में रूस, कजाकिस्तान और बेलारूस सहित केवल आठ सदस्य देश शेष रह गए हैं। 1991 में स्थापित इस क्षेत्रीय गुट को पूरी तरह छोड़ने वाला मोल्दोवा अब जॉर्जिया (2008) और यूक्रेन (2018) के बाद तीसरा देश बन गया है। यह निर्णय स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि पूर्वी यूरोप के देश अब पुराने क्षेत्रीय गठबंधनों के बजाय पश्चिमी लोकतांत्रिक प्रणालियों में अपना भविष्य देख रहे हैं।

3 दृश्य

स्रोतों

  • Deutsche Welle

  • Vertex AI Search

  • Wikipedia

  • Modern Diplomacy

  • Euractiv

क्या आपने कोई गलती या अशुद्धि पाई?हम जल्द ही आपकी टिप्पणियों पर विचार करेंगे।