बाह्य आश्वासन से आंतरिक आत्म-मूल्य की ओर: मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण
द्वारा संपादित: Olga Samsonova
मनोविज्ञान के क्षेत्र में, निरंतर आश्वासन की खोज को केवल एक बुनियादी आवश्यकता के रूप में नहीं, बल्कि एक अस्थायी विनियमन रणनीति के रूप में देखा जाता है जो अंततः व्यक्ति को दूसरों पर निर्भरता के चक्र में फँसा देती है। यह बाहरी अनुमोदन, चाहे वह सामाजिक माध्यमों से हो या व्यक्तिगत संवादों से, केवल क्षणिक राहत प्रदान करता है, जिससे आत्म-मूल्य की नींव नाजुक बनी रहती है और यह पूरी तरह से अन्य लोगों की उपलब्धता पर निर्भर हो जाती है। यह निर्भरता तब और अधिक गंभीर हो जाती है जब व्यक्तिगत मूल्य ऑनलाइन पहचान से जुड़ जाता है, जिससे नकारात्मक बातचीत के भावनात्मक परिणाम विनाशकारी हो सकते हैं।
शोधकर्ताओं ने आंतरिक रूप से मजबूत आत्म-मूल्य विकसित करने के लिए पाँच अनुसंधान-आधारित कार्यप्रणाली की पहचान की है, जो भावनात्मक सहनशीलता और आत्म-विश्वास के निर्माण पर केंद्रित हैं। इन पद्धतियों में छोटे-छोटे वादों को पूरा करके व्यक्तिगत विश्वसनीयता का मूर्त प्रमाण प्रदान करना शामिल है, जिससे आत्म-मूल्य का निर्माण होता है। उदाहरण के लिए, जिस प्रकार माता-पिता द्वारा बच्चों के छोटे कार्यों की सराहना करने से आत्मविश्वास पुन: जागृत हो सकता है, उसी प्रकार स्वयं के प्रति यह जवाबदेही आंतरिक शक्ति प्रदान करती है।
आत्म-मूल्य को बढ़ाने के लिए भावनात्मक सहनशीलता का अभ्यास करना और अनिश्चितता की स्थिति को सहना महत्वपूर्ण है, जिससे तत्काल स्पष्टीकरण मांगने की प्रवृत्ति पर रोक लगती है। इसके अतिरिक्त, संज्ञानात्मक लचीलेपन का उपयोग करके व्यक्तिगत मूल्य को सामाजिक परिणामों से अलग किया जा सकता है, जिससे अस्पष्ट अंतःक्रियाओं के लिए वैकल्पिक स्पष्टीकरणों की खोज की जा सके। यह दृष्टिकोण उन लोगों के विपरीत है जो केवल बाह्य मूल्यों पर ध्यान केंद्रित करते हैं, जैसे कि वित्तीय सफलता और प्रसिद्धि, जो दूसरों की प्रशंसा पर निर्भर करते हैं।
बाहरी सत्यापन को आत्म-स्वीकृति और आत्म-करुणा से प्रतिस्थापित करने से आंतरिक देखभाल प्रणालियाँ सक्रिय होती हैं, जो भावनात्मक समर्थन का एक स्थायी स्रोत प्रदान करती हैं। यह आंतरिक समर्थन प्रणाली विकसित करना महत्वपूर्ण है, विशेष रूप से उन लोगों के लिए जो बचपन के बहिष्कार या बदमाशी के अनुभवों से गुज़रे हैं, जहाँ एक अटूट रिश्ते की आवश्यकता महसूस होती है। आत्म-करुणा का अभ्यास करने से व्यक्ति अपनी आंतरिक देखभाल प्रणाली को सक्रिय करता है, जिससे बाहरी स्रोतों पर निर्भरता कम होती है।
आत्म-मूल्य को सामाजिक प्रतिक्रियाओं के बजाय मुख्य मूल्यों और जानबूझकर की गई कार्रवाइयों पर आधारित करना, स्वीकृति और प्रतिबद्धता चिकित्सा (एसीटी) का एक केंद्रीय सिद्धांत है। जब व्यक्ति अपने आंतरिक सिद्धांतों के पालन के आधार पर अपने मूल्य का आकलन करता है, न कि बाहरी प्रतिक्रियाओं के आधार पर, तो निरंतर पुष्टि की आवश्यकता स्वतः ही समाप्त हो जाती है। यह आंतरिक आधार, जैसा कि भारतीय संविधान निर्माताओं ने सामाजिक न्याय और समानता के सिद्धांतों को स्थापित किया, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आत्म-सम्मान की नींव रखता है, जहाँ प्रत्येक नागरिक राष्ट्र निर्माण में भागीदार बन सकता है। इस प्रकार, आत्म-मूल्य का पोषण एक सतत प्रक्रिया है जो आंतरिक सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्धता और भावनात्मक स्वायत्तता पर निर्भर करती है, जिससे एक अधिक स्थिर और टिकाऊ आत्म-बोध प्राप्त होता है।
24 दृश्य
स्रोतों
Forbes
MindLAB Neuroscience
Forbes
ResearchGate
NovoPsych
इस विषय पर और अधिक समाचार पढ़ें:
क्या आपने कोई गलती या अशुद्धि पाई?हम जल्द ही आपकी टिप्पणियों पर विचार करेंगे।
