ताइवान के विदेश मंत्री वू झाओक्सी का विमान म्बाबाने में उसी समय उतरा, जब राष्ट्रपति लाई चिंग-ते को अपनी यात्रा रद्द करने के लिए मजबूर होने के कुछ ही दिन बीते थे। आधिकारिक तौर पर इसे 'तकनीकी कारण' बताया गया, लेकिन असल में यह बीजिंग की 'गाजर और छड़ी' वाली पारंपरिक कूटनीति का नमूना था। हालांकि, समर्पण करने के बजाय ताइपे ने फौरन अपने अगले वरिष्ठ अधिकारी को वहां भेज दिया। यह साधारण सा दिखने वाला कदम एक कड़ा संदेश है कि ताइवान अफ्रीका में अपने आखिरी ठिकानों को इतनी आसानी से छोड़ने वाला नहीं है।
एस्वातिनी अब अफ्रीका का इकलौता ऐसा देश है जो आधिकारिक रूप से ताइवान को मान्यता देता है। ताइपे के बचे हुए बारह राजनयिक सहयोगियों में यह सबसे संवेदनशील होने के साथ-साथ सबसे अडिग भी है। बीजिंग काफी समय से ताइवान को अफ्रीका से बाहर करने के लिए व्यवस्थित अभियान चला रहा है, जिसमें उदार ऋणों से लेकर सीधी धमकियां तक शामिल हैं। कुछ साल पहले बुर्किना फासो और साओ तोमे और प्रिंसिपे चीन के पाले में चले गए थे, लेकिन भारी आर्थिक दबाव के बावजूद एस्वातिनी अब भी मजबूती से टिका हुआ है।
वू झाओक्सी का यह दौरा महज औपचारिक उपहारों का आदान-प्रदान नहीं है। यह 'हर हाल में उच्च-स्तरीय संपर्क' बनाए रखने की ताइपे की सोची-समझी रणनीति का विस्तार है। ताइवानी राजनयिक समझते हैं कि यदि उच्च-स्तरीय दौरे रुक गए, तो सहयोगियों के मन में यह संदेह पैदा होने लगेगा कि ताइपे का साथ देना सार्थक है भी या नहीं। ऐसी हर यात्रा इस बात का सार्वजनिक प्रमाण है कि उनके बीच का संबंध जीवित और प्रभावी है। यह कदम विशेष रूप से तब और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब चीन 'बेल्ट एंड रोड' पहल के माध्यम से अफ्रीकी देशों को अपने प्रभाव क्षेत्र में शामिल करने का सक्रिय प्रयास कर रहा है।
यह घटनाक्रम केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके व्यापक अंतरराष्ट्रीय मायने हैं। बहुपक्षीय संगठनों में ताइवान के सहयोगियों का हर एक वोट बीजिंग के प्रस्तावों को अवरुद्ध करने या कम से कम 'ताइवान प्रश्न' पर चर्चा को जीवित रखने का एक अवसर होता है। 'ग्लोबल साउथ' के देश इस मुकाबले को बारीकी से देख रहे हैं। इनमें से कई देश चीनी निवेश तो प्राप्त कर रहे हैं, लेकिन साथ ही वे किसी एक महाशक्ति पर अत्यधिक निर्भर होने से डरते भी हैं। ताइवान इसी डर को कुशलतापूर्वक भुनाते हुए खुद को एक तकनीकी, लोकतांत्रिक और बिना किसी राजनीतिक वफादारी की शर्त के बुनियादी ढांचा प्रदान करने वाले वैकल्पिक भागीदार के रूप में पेश कर रहा है।
कूटनीति के इस खेल को खेल के मैदान में 'डॉज बॉल' के खेल की तरह समझें। चीन उस बड़े और शक्तिशाली खिलाड़ी की तरह है जो व्यवस्थित रूप से एक-एक करके सबको खेल से बाहर कर रहा है। वहीं ताइवान, छिपने के बजाय अचानक घेरे के बीच में आकर अपनी मौजूदगी का एहसास कराता है। यह साहसी कदम अन्य देशों को यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या वाकई वह बड़ा खिलाड़ी अपराजेय है? वर्तमान दौरे जैसी यात्राएं ठीक यही मनोवैज्ञानिक प्रभाव पैदा करती हैं।
ऐतिहासिक रूप से, ताइवान ने 1970 के दशक में संयुक्त राष्ट्र में अपनी जगह खोने के बाद भी सहयोगियों की भारी कमी का दौर देखा है। उस समय कई लोगों का मानना था कि यह मामला हमेशा के लिए सुलझ गया है। हालांकि, ताइपे ने हर बार खेल में बने रहने के नए तरीके खोज लिए। आज की उसकी रणनीति अंधाधुंध पैसा खर्च करने की नहीं, बल्कि एक सटीक और चतुर कूटनीति की है, जो साझा मूल्यों, तकनीक और नेताओं के बीच व्यक्तिगत संबंधों पर केंद्रित है।
अंततः, एस्वातिनी का यह दौरा केवल एक छोटे अफ्रीकी देश के बारे में नहीं है। यह इस बारे में है कि क्या ताइवान अंतरराष्ट्रीय कानून की नजर में खुद को पूरी तरह अलग-थलग होने से बचाने के लिए जरूरी कूटनीतिक जगह सुरक्षित रख पाएगा। जब तक ऐसी यात्राएं जारी हैं, बीजिंग अपनी अंतिम जीत का दावा नहीं कर सकता। और इसका अर्थ यही है कि यह वैश्विक खेल अभी भी पूरी तरह खुला हुआ है।



