मनोवैज्ञानिक विश्लेषण: मित्रता में ईर्ष्या का मूल कारण आत्म-मूल्य की कमी

द्वारा संपादित: Olga Samsonova

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मनोवैज्ञानिक परामर्श यह स्पष्ट करता है कि किसी करीबी मित्र की सफलता पर उत्पन्न होने वाली तीव्र नकारात्मक भावनाएँ, जिन्हें ईर्ष्या कहा जाता है, अक्सर मित्रता के ताने-बाने से कम और व्यक्ति की आंतरिक आत्म-मूल्य की समस्याओं से अधिक जुड़ी होती हैं। यह एक महत्वपूर्ण अवलोकन है, क्योंकि यह समस्या के समाधान की दिशा को मित्रता से हटाकर आत्म-सुधार की ओर मोड़ता है। मनोवैज्ञानिक नैथनियल ब्रैंडेन के अनुसार, चिंता और अवसाद से लेकर सफलता के डर तक, शायद ही कोई ऐसी मनोवैज्ञानिक समस्या हो जिसका स्रोत आत्म-सम्मान की कमी न हो।

यह सिद्धांत बताता है कि जब कोई व्यक्ति स्वयं को अपर्याप्त महसूस करता है, तो वह दूसरों की प्रगति को अपनी विफलता के रूप में देख सकता है। एक पाठक ने अपनी उस पीड़ा को व्यक्त किया जो उसे तब महसूस हुई जब उसकी लंबे समय से मित्र, जिसने हाल ही में करियर में बड़ी उन्नति और एक नया संबंध प्राप्त किया था, के जीवन में महत्वपूर्ण सकारात्मक बदलाव आए, जिससे उसे स्वयं में हीनता का अनुभव हुआ। विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते हैं कि जब कोई व्यक्ति सत्यापन (validation) के लिए मित्र पर अत्यधिक निर्भर हो जाता है, तो वह ऐसी भावनाओं के प्रति संवेदनशील हो जाता है; ये भावनाएँ वास्तव में व्यक्ति की अपनी अनसुलझी आवश्यकताओं का संकेत होती हैं।

ईर्ष्या या आक्रोश जैसी भावनाएँ मानव स्वभाव का हिस्सा हैं, लेकिन इन पर आक्रामक रूप से प्रतिक्रिया करना या पूरी तरह से पीछे हट जाना संबंधों को गंभीर रूप से क्षति पहुँचा सकता है। मूल समस्या अक्सर व्यक्तिगत जीवन और करियर में आत्म-संतुष्टि की कमी में निहित होती है, जिसके कारण व्यक्ति अपने वास्तविक जीवन की तुलना मित्र की कथित सफलता से करने लगता है। यह तुलनात्मक रवैया असुरक्षा की भावना को जन्म देता है। हालाँकि, यह समझना महत्वपूर्ण है कि ईर्ष्या होना गलत नहीं है, लेकिन इसका अत्यधिक होना मानसिक तनाव और संबंधों में समस्याओं को जन्म दे सकता है।

इसके विपरीत, शानदार दोस्ती ईर्ष्या और द्वेष से परे, निःस्वार्थ होती है, और अच्छे दोस्त प्रतिभा के विकास और व्यक्तित्व के उत्कर्ष में सहायक होते हैं। इस भावनात्मक उथल-पुथल को प्रबंधित करने के लिए, व्यक्तियों को अपने व्यक्तिगत लक्ष्यों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, जैसे कि नए कौशल हासिल करना या मित्रता के दायरे से बाहर व्यक्तिगत संतुष्टि प्राप्त करना। यह दृष्टिकोण आत्म-करुणा को बढ़ावा देता है और इस पहचान को मजबूत करता है कि सच्चा संबंध आपसी विकास का समर्थन करता है, न कि निरंतर तुलना का।

यदि मित्र की सफलता लगातार और असहनीय पीड़ा का कारण बन रही है, या यदि वह संबंध नकारात्मक व्यवहार को बढ़ावा देता है, तभी दूरी बनाना उचित हो सकता है। इसके अतिरिक्त, आत्म-स्वीकृति और यह समझना कि आप जो हैं, उसमें मूल्यवान हैं, ईर्ष्या को कम करने की दिशा में पहला कदम है। स्वामी विवेकानंद ने भी संकेत दिया था कि भौतिक समृद्धि के बावजूद, हमें याचक नहीं बनना चाहिए, क्योंकि हमारे पास देने के लिए बहुत कुछ है। अंततः, अपनी ऊर्जा को दूसरों की उपलब्धियों पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, स्वयं के सुधार और आत्म-चिंतन पर लगाना मानसिक शांति और संतुष्टि का मार्ग प्रशस्त करता है, क्योंकि संतोष ही सबसे बड़ा सुख है।

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स्रोतों

  • Marie Claire

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  • vertexaisearch.cloud.google.com

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