आधुनिक उपवास: स्वास्थ्य, सजगता और आत्म-नियंत्रण की ओर एक प्रवृत्ति

द्वारा संपादित: Olga Samsonova

समकालीन उपवास की प्रथाएं अब केवल पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि स्वास्थ्य लाभ, अति-उपभोग पर नियंत्रण, सजगता और आत्म-अनुकूलन जैसे आधुनिक लक्ष्यों पर केंद्रित हो गई हैं। यह बदलाव दर्शाता है कि व्यक्ति अपने शारीरिक और मानसिक कल्याण पर अधिक सक्रिय रूप से ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। शोध बताते हैं कि उत्तरदाताओं में से 70 प्रतिशत लोग उपवास को चिकित्सकीय रूप से तर्कसंगत मानते हैं, और विशेष रूप से 18 से 29 वर्ष की आयु के लोगों में यह सहमति 85 प्रतिशत तक पहुँच जाती है, जो युवा जनसांख्यिकी के बीच इसकी बढ़ती लोकप्रियता को रेखांकित करता है।

विशेषज्ञ आधुनिक उपवास को एक समृद्धि घटना के रूप में वर्गीकृत करते हैं, जिसे अक्सर शिक्षित, शहरी आबादी द्वारा अपनाया जाता है जो भोजन या स्मार्टफोन के उपयोग जैसी आदतों पर नियंत्रण पाने की इच्छा रखते हैं। यह प्रवृत्ति रुक-रुक कर उपवास (इंटरमिटेंट फास्टिंग), डिजिटल डिटॉक्स, और सचेत खान-पान (माइंडफुल ईटिंग) जैसे विभिन्न रूपों को समाहित करती है, जो बढ़ी हुई जागरूकता और व्यक्तिगत सुधार पर व्यापक सामाजिक ध्यान को दर्शाते हैं। उदाहरण के लिए, डिजिटल डिटॉक्स, जो स्मार्टफोन और अन्य उपकरणों से एक निश्चित अवधि के लिए परहेज है, का उद्देश्य अत्यधिक स्क्रीन समय के नकारात्मक प्रभावों का मुकाबला करना और मानसिक स्पष्टता में सुधार करना है।

वर्ष 2026 में किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार, शीर्ष तीन खाद्य पदार्थों का त्याग क्रमशः शराब (75 प्रतिशत), मिठाइयाँ (71 प्रतिशत), और मांस (52 प्रतिशत) था। मांस का त्याग करने की इच्छा आयु और शिक्षा के स्तर से दृढ़ता से जुड़ी हुई है, जिसमें युवा और अधिक शिक्षित समूहों के बीच इसकी स्वीकार्यता अधिक देखी गई है। यह प्रवृत्ति आत्म-नियंत्रण और जीवनशैली के चयन में शिक्षा की भूमिका को उजागर करती है।

इसके अतिरिक्त, उपवास के दौरान ऑटोफैगी नामक एक जैविक प्रक्रिया को बढ़ावा मिलता है, जिसमें कोशिकाएं क्षतिग्रस्त घटकों को हटाकर स्वयं को साफ करती हैं, जो दीर्घायु और कोशिकीय स्वास्थ्य के लिए सहायक मानी जाती है। आहार और मानसिक स्वास्थ्य के बीच का संबंध जटिल है; अध्ययनों से पता चलता है कि फलों और सब्जियों का सेवन मूड को बेहतर बना सकता है, जबकि परिष्कृत चीनी वाले खाद्य पदार्थों से मानसिक स्वास्थ्य संबंधी विकारों का जोखिम बढ़ जाता है। भारत में, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, लगभग 6.5 प्रतिशत भारतीय गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से पीड़ित हैं, जो आहार संबंधी हस्तक्षेपों के महत्व को रेखांकित करता है।

उपवास के वैज्ञानिक लाभों पर भी ध्यान दिया जा रहा है; उदाहरण के लिए, 45 घंटे के उपवास से इंसुलिन रिसेप्टर्स की कार्यकुशलता में सुधार हो सकता है और 'सेरोटोनिन' नामक हार्मोन का स्तर बढ़ सकता है। आधुनिक जीवनशैली में, जहां डिजिटल उपकरणों का उपयोग काफी बढ़ गया है, ई-फास्टिंग और डिजिटल डिटॉक्स की आवश्यकता महसूस की जा रही है ताकि शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों से बचा जा सके। यह आत्म-अनुकूलन का एक व्यापक दृष्टिकोण है, जिसमें केवल भोजन ही नहीं, बल्कि प्रौद्योगिकी के साथ हमारे संबंध को भी नियंत्रित करना शामिल है, ताकि एक संतुलित जीवन शैली अपनाई जा सके।

रूस के साइबेरिया में, गोर्याचिंस्क नामक शहर में एक प्रसिद्ध अस्पताल है जो 1995 से उपवास द्वारा बीमारियों का इलाज कर रहा है, जो इस पद्धति के ऐतिहासिक और वैज्ञानिक अनुप्रयोग को दर्शाता है। यह इंगित करता है कि उपवास की प्रथाएं धार्मिक आस्था से परे जाकर एक स्थापित स्वास्थ्य विज्ञान का रूप ले रही हैं।

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स्रोतों

  • Donaukurier

  • DAK-Studie: Fasten bleibt bei jungen Menschen beliebt

  • Radio Bochum

  • ANTENNE BAYERN

  • Der Patriot

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