उप्साला विश्वविद्यालय की प्रोफेसर मारिया स्ट्रॉम ने वर्ष 2025 में एक सैद्धांतिक मॉडल प्रस्तुत किया है जो वास्तविकता की प्रकृति पर एक मौलिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। यह मॉडल वैज्ञानिक पत्रिका एआईपी एडवांसेज (AIP Advances) में प्रकाशित हुआ, जिसे उस अंक का सर्वश्रेष्ठ लेख घोषित किया गया और कवर पर भी प्रदर्शित किया गया। इस सिद्धांत का मूल सार यह है कि चेतना भौतिक मस्तिष्क की गतिविधि का परिणाम नहीं है, बल्कि यह एक मौलिक क्षेत्र है जो समय, स्थान और पदार्थ के उद्भव से भी पहले अस्तित्व में था।
प्रोफेसर स्ट्रॉम, जो सामग्री विज्ञान और इंजीनियरिंग विभाग के नैनो टेक्नोलॉजी और कार्यात्मक सामग्री (NFM) अनुसंधान समूह का नेतृत्व करती हैं, ने इस महत्वाकांक्षी ढांचे को विकसित किया है। यह ढांचा क्वांटम भौतिकी के विचारों को गैर-द्वैतवादी दर्शन के साथ एकीकृत करने का प्रयास करता है, जो भौतिक संरचनाओं और चेतना के बीच के संबंध पर गहन प्रश्न उठाता है। प्रोफेसर स्ट्रॉम का यह कार्य उनके स्थापित नैनो टेक्नोलॉजी अनुसंधान से एक महत्वपूर्ण विचलन को चिह्नित करता है, जो उन्हें सबसे छोटे पैमाने से ब्रह्मांड के सबसे बड़े और सबसे मौलिक प्रश्नों की ओर ले जाता है।
यह सिद्धांत आइंस्टीन, श्रोडिंगर, हाइजेनबर्ग और प्लैंक जैसे महान भौतिकविदों द्वारा खोले गए विचारों पर आधारित है, जो भौतिकी में ऐतिहासिक प्रतिमान बदलावों की याद दिलाता है। एआईपी एडवांसेज, जो भौतिक विज्ञान के सभी क्षेत्रों में काम प्रकाशित करता है, एक ओपन एक्सेस पत्रिका है, जिसका अर्थ है कि यह शोध तुरंत वैश्विक दर्शकों के लिए उपलब्ध कराया गया है। इस सैद्धांतिक प्रस्ताव में, स्ट्रॉम यह निष्कर्ष निकालती हैं कि चेतना प्राथमिक है, और समय, स्थान और पदार्थ जैसी संरचनाएं बाद में उत्पन्न होती हैं, जो कथित वास्तविकता का वर्णन करने का एक साहसिक प्रयास है। यह सिद्धांत कई वैज्ञानिक क्षेत्रों में परीक्षण योग्य भविष्यवाणियों को शामिल करने का दावा करता है, जो इसे केवल दार्शनिक चर्चा से परे ले जाता है।
प्रोफेसर स्ट्रॉम, जो उप्साला विश्वविद्यालय में नैनो टेक्नोलॉजी में एक अग्रणी व्यक्ति हैं, ने अपने पूर्व के शोध में पर्यावरण के अनुकूल शैवाल बैटरी और 'अपसालाइट' (Upsalite®) जैसी सामग्रियों का विकास शामिल किया है, जो उनके व्यावहारिक अनुप्रयोगों पर ध्यान केंद्रित करने की प्रवृत्ति को दर्शाता है। हालांकि, यह नया सिद्धांत उन्हें भौतिकी की आधारशिलाओं पर विचार करने के लिए प्रेरित करता है, जहां वे ब्रह्मांड के मूलभूत घटक के रूप में सार्वभौमिक चेतना की परिकल्पना करती हैं। इस ढांचे के अनुसार, बिग बैंग से पहले की स्थिति एक कालातीत और अविभेदित क्षमता के रूप में मौजूद थी, जिसमें स्थान, समय या पदार्थ का अभाव था।
स्ट्रॉम का मॉडल आत्म-चिंतन को एक अनूठा तंत्र बताता है जिसके माध्यम से सार्वभौमिक चेतना स्वयं के प्रति जागरूक होकर विभेदित हो सकती है। यह एक रचनात्मक प्रतिक्रिया लूप है जिसमें जागरूकता ही रूप को जन्म देती है, जो भौतिकी और गैर-द्वैतवादी दर्शन के बीच एक सैद्धांतिक सेतु बनाने का प्रयास है। यह कार्य भौतिकी और दर्शनशास्त्र के सबसे गहरे सवालों में से एक को संबोधित करता है: भौतिक वास्तविकता और व्यक्तिपरक अनुभव के बीच संबंध क्या है। यह सिद्धांत, यदि सत्यापित होता है, तो भौतिकी और चेतना के अध्ययन में एक महत्वपूर्ण वैचारिक बदलाव ला सकता है, जैसा कि अतीत में महान वैज्ञानिक क्रांतियों में देखा गया है।



