वारसॉ बना पशु क्रूरता के खिलाफ खड़ा होने वाला यूरोपीय संघ का 18वां देश: फर फार्मिंग पर लगा आधिकारिक प्रतिबंध

लेखक: Tatyana Hurynovich

वारसॉ बना पशु क्रूरता के खिलाफ खड़ा होने वाला यूरोपीय संघ का 18वां देश: फर फार्मिंग पर लगा आधिकारिक प्रतिबंध-1

पोलैंड के राष्ट्रपति करोल नवरोत्स्की (Karol Nawrocki) ने हाल ही में एक ऐतिहासिक कानून पर हस्ताक्षर किए हैं, जो देश के भीतर पशु फर फार्मों के संचालन को पूरी तरह से समाप्त करने का मार्ग प्रशस्त करता है। इस विधायी कदम का 'यूरोपियन ह्यूमेन वर्ल्ड फॉर एनिमल्स यूरोप' (European Humane World for Animals Europe) सहित कई अंतरराष्ट्रीय पशु अधिकार संगठनों ने व्यापक स्वागत किया है। यह निर्णय पोलैंड में पशु कल्याण के मानकों को वैश्विक स्तर पर ले जाने की दिशा में एक क्रांतिकारी मोड़ माना जा रहा है।

इस नए कानून के लागू होने से पहले तक, पोलैंड चीन के बाद यूरोप में फर का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश बना हुआ था। आंकड़ों के अनुसार, पोलैंड के विभिन्न फार्मों में हर साल लगभग तीस लाख मिंक, लोमड़ी, रैकून डॉग और चिंचिला जैसे जानवरों को केवल उनके फर के लिए पाला जाता था। यह महत्वपूर्ण फैसला यूरोपीय खाद्य सुरक्षा प्राधिकरण (EFSA) की उस विस्तृत रिपोर्ट के ठीक एक सप्ताह बाद लिया गया है, जिसमें जानवरों के रहने की स्थितियों में गंभीर और व्यवस्थित खामियों की ओर इशारा किया गया था। यह रिपोर्ट 'फर फ्री यूरोप' (Fur Free Europe) नामक एक नागरिक पहल के हिस्से के रूप में तैयार की गई थी, जिसे 15 लाख से अधिक यूरोपीय नागरिकों ने अपना समर्थन दिया था। अब मार्च 2026 तक, यूरोपीय आयोग को पूरे यूरोपीय संघ में फर उत्पादन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के संबंध में अपनी आधिकारिक स्थिति प्रस्तुत करनी होगी।

'ह्यूमेन वर्ल्ड फॉर एनिमल्स' के पोलिश कार्यालय की निदेशक इगा ग्लाज़ेस्का-ब्रोमैंट (Iga Glazewska-Bromant) ने इस कदम को एक 'ऐतिहासिक क्षण' के रूप में वर्णित किया है। उनके वक्तव्य के अनुसार, यह कानून लाखों बेजुबान जानवरों की पीड़ा और फर उद्योग की अमानवीय प्रथाओं पर हमेशा के लिए विराम लगा देगा। उन्होंने इस बात को भी रेखांकित किया कि पोलैंड की अधिकांश जनता इस क्रूर उद्योग के खिलाफ रही है, जिसका प्रमाण राष्ट्रपति को व्यक्तिगत रूप से सौंपे गए लगभग 76,000 हस्ताक्षर और हाल के वर्षों में किए गए विभिन्न जनमत सर्वेक्षणों में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

कानूनी प्रावधानों के अनुसार, यह प्रतिबंध कानून के आधिकारिक प्रकाशन के दो सप्ताह बाद प्रभावी हो जाएगा। हालांकि, मौजूदा किसानों को इस बदलाव के साथ तालमेल बिठाने के लिए जनवरी 2034 तक का एक लंबा संक्रमण काल (transition period) प्रदान किया गया है। गौर करने वाली बात यह है कि सरकारी मुआवजा केवल 2030 तक ही उपलब्ध होगा, जिसके कारण विशेषज्ञों का अनुमान है कि कई फार्म मालिक आर्थिक लाभ को देखते हुए अपनी इकाइयों को निर्धारित समय सीमा से बहुत पहले ही बंद कर सकते हैं। इस निर्णय के साथ पोलैंड अब उन यूरोपीय देशों के समूह में शामिल हो गया है जहाँ फर फार्मिंग पहले से ही प्रतिबंधित या सीमित है, जिनमें रोमानिया, लिथुआनिया, ऑस्ट्रिया, जर्मनी, नीदरलैंड, इटली, ब्रिटेन, चेक गणराज्य, स्लोवाकिया, बुल्गारिया, लातविया, एस्टोनिया, बेल्जियम, स्वीडन, लक्ज़मबर्ग, क्रोएशिया, आयरलैंड और माल्टा प्रमुख हैं।

भले ही पोलैंड ने यह साहसिक कदम उठाया है, लेकिन फिनलैंड, डेनमार्क, स्पेन, हंगरी और ग्रीस जैसे कुछ यूरोपीय देशों में यह प्रथा अब भी जारी है। 'ह्यूमेन वर्ल्ड फॉर एनिमल्स' ने पोलिश सक्रियतावादी समूहों जैसे 'ओपन केजेस' (Open Cages) और 'विवा!' (Viva!) के साथ मिलकर लंबे समय से इस एंटी-फर आंदोलन को गति दी है। इन संगठनों का निरंतर प्रयास रहा है कि न केवल पोलैंड, बल्कि पूरे यूरोप को फर उत्पादन से मुक्त कराया जाए, ताकि जानवरों के प्रति संवेदनशीलता को बढ़ावा मिल सके।

नैतिक आधारों के अलावा, इस प्रतिबंध के पीछे मजबूत पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संबंधी तर्क भी मौजूद हैं। प्राकृतिक फर के लिए बड़े पैमाने पर जानवरों का पालन-पोषण न केवल उच्च कार्बन फुटप्रिंट का कारण बनता है, बल्कि यह ज़ूनोटिक संक्रमणों (पशुओं से मनुष्यों में फैलने वाली बीमारियां) के प्रसार का एक बड़ा जोखिम भी पैदा करता है। हाल के वर्षों में, कोरोना वायरस और बर्ड फ्लू (H5N1) के प्रकोप के कारण यूरोपीय फार्मों पर एहतियात के तौर पर पांच लाख से अधिक जानवरों को मारना पड़ा था। इसके अतिरिक्त, आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि फर उद्योग अब एक घाटे का क्षेत्र बन चुका है, जिससे यूरोपीय संघ के नागरिकों को प्रति वर्ष लगभग 446 मिलियन यूरो का बोझ उठाना पड़ता है। यही कारण है कि दुनिया के बड़े फैशन डिजाइनर अब प्राकृतिक फर के बजाय टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल विकल्पों को प्राथमिकता दे रहे हैं।

निष्कर्षतः, पोलैंड का यह निर्णय न केवल पशु अधिकारों की एक बड़ी जीत है, बल्कि यह एक आधुनिक और नैतिक समाज की ओर बढ़ते कदम का प्रतीक भी है। यह कानून यह सुनिश्चित करेगा कि भविष्य की पीढ़ियां एक ऐसे समाज में रहें जहाँ फैशन के नाम पर बेगुनाह जानवरों की बलि न दी जाए। यह कदम निश्चित रूप से अन्य देशों को भी अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करने और पशु कल्याण की दिशा में ठोस कदम उठाने के लिए प्रेरित करेगा।

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स्रोतों

  • Human World for Animals

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