संयुक्त राज्य अमेरिका ने सितंबर 2025 में होने वाली संयुक्त राष्ट्र महासभा में भाग लेने वाले फिलिस्तीनी अधिकारियों के लिए वीज़ा जारी करने से इनकार कर दिया है और पहले से जारी वीज़ा रद्द कर दिए हैं। यह अभूतपूर्व कदम, जिसकी घोषणा अमेरिकी विदेश विभाग ने की है, फिलिस्तीनी प्राधिकरण (पीए) और फिलिस्तीनी मुक्ति संगठन (पीएलओ) के प्रति अमेरिकी सरकार के कड़े रुख को दर्शाता है। विदेश विभाग ने इस कार्रवाई का कारण बताते हुए कहा कि पीए और पीएलओ ने शांति की संभावनाओं को कमजोर किया है और अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा करने में विफल रहे हैं।
इस निर्णय का सीधा असर फिलिस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास की महासभा को संबोधित करने की योजना पर पड़ सकता है, जो पारंपरिक रूप से इस वैश्विक मंच का उपयोग फिलिस्तीनी मुद्दे को उठाने के लिए करते हैं। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि अब्बास स्वयं इस वीज़ा प्रतिबंध से प्रभावित होंगे या नहीं, लेकिन यह कदम फिलिस्तीनी नेतृत्व की अंतरराष्ट्रीय भागीदारी को सीमित करने का एक प्रयास माना जा रहा है। फिलिस्तीनी अधिकारियों ने इस फैसले पर गहरी हैरानी और अफसोस जताया है, इसे अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय समझौते का उल्लंघन बताया है।
अमेरिकी विदेश विभाग ने अपने बयान में कहा कि यह कदम राष्ट्रीय सुरक्षा के हितों में उठाया गया है ताकि पीएलओ और पीए को उनकी प्रतिबद्धताओं का पालन न करने और शांति की संभावनाओं को कमजोर करने के लिए जवाबदेह ठहराया जा सके। विभाग ने यह भी उल्लेख किया कि पीए और पीएलओ ने अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (आईसीसी) और अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (आईसीजे) जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों के माध्यम से अपने संघर्ष को अंतर्राष्ट्रीय बनाने का प्रयास किया है, और आतंकवाद को बढ़ावा देना जारी रखा है। इन कार्रवाइयों को हमास द्वारा बंधकों को छोड़ने से इनकार करने और गाजा में युद्धविराम वार्ता के टूटने में योगदान देने वाला बताया गया है।
यह ध्यान देने योग्य है कि जुलाई 2025 में भी अमेरिका ने पीए और पीएलओ के सदस्यों पर इसी तरह के प्रतिबंध लगाए थे। यह घटनाक्रम ऐसे समय में आया है जब कनाडा, यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया जैसे कई पश्चिमी देश फिलिस्तीनी राज्य की मान्यता की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं। इन देशों ने सितंबर में संयुक्त राष्ट्र महासभा में फिलिस्तीनी राज्य को मान्यता देने की अपनी मंशा जताई है, जो इस क्षेत्र में कूटनीतिक परिदृश्य को और जटिल बना रहा है।
ऐतिहासिक रूप से, अमेरिका ने 1988 में पीएलओ नेता यासर अराफात को वीज़ा देने से इनकार कर दिया था, जिसके कारण संयुक्त राष्ट्र महासभा का एक सत्र जिनेवा स्थानांतरित करना पड़ा था। यह वर्तमान निर्णय उस ऐतिहासिक मिसाल को दोहराता है, जो फिलिस्तीनी प्रतिनिधित्व के लिए अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पहुंच को नियंत्रित करने के अमेरिकी प्रयासों को रेखांकित करता है। हालांकि, संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय समझौते के तहत, फिलिस्तीनी मिशन के स्थायी कर्मचारियों को वीज़ा छूट दी जाएगी, जिससे वे न्यूयॉर्क में अपने कार्यों को जारी रख सकेंगे। यह स्थिति फिलिस्तीनी कूटनीति के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती पेश करती है, क्योंकि वे अंतरराष्ट्रीय समुदाय से समर्थन जुटाने का प्रयास कर रहे हैं।