संयुक्त राज्य अमेरिका ने अगस्त 2025 में घोषणा की कि वह नवंबर 2025 में जिनेवा में होने वाली संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) की सार्वभौमिक आवधिक समीक्षा (UPR) में भाग नहीं लेगा। यह निर्णय राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के फरवरी 2025 के उस कार्यकारी आदेश का परिणाम है जिसमें अमेरिका को UNHRC से अलग करने का निर्देश दिया गया था। यह कदम 2018 में ट्रम्प प्रशासन द्वारा परिषद से पहले की गई वापसी की याद दिलाता है।
UPR, 2006 में मानवाधिकार परिषद द्वारा स्थापित एक अनूठी प्रक्रिया है, जिसके तहत संयुक्त राष्ट्र के सभी 193 सदस्य देशों के मानवाधिकार रिकॉर्ड की सहकर्मी समीक्षा की जाती है। यह प्रक्रिया प्रत्येक देश को अपने देश में मानवाधिकारों की स्थिति में सुधार के लिए उठाए गए कदमों को प्रस्तुत करने और चुनौतियों पर काबू पाने का अवसर प्रदान करती है। अमेरिका ने 2008 में UPR प्रक्रिया शुरू होने के बाद से तीन चक्रों में भाग लिया है, जिसमें अंतिम समीक्षा नवंबर 2020 में हुई थी।
अमेरिकी विदेश विभाग के एक प्रवक्ता ने इस निर्णय का औचित्य बताते हुए कहा कि UPR में भाग लेने का अर्थ परिषद के जनादेश और गतिविधियों को स्वीकार करना है, और यह उन गंभीर मानवाधिकारों के उल्लंघनकर्ताओं की निंदा करने में परिषद की लगातार विफलता को नजरअंदाज करता है। प्रवक्ता ने चीन और क्यूबा जैसे देशों का उदाहरण दिया, जिन्हें वे परिषद के सदस्य के रूप में मानवाधिकारों के उल्लंघनकर्ता मानते हैं।
हालांकि, अमेरिकन सिविल लिबर्टीज यूनियन (ACLU) और PEN अमेरिका जैसे मानवाधिकार संगठनों ने इस कदम की कड़ी आलोचना की है। ACLU का मानना है कि यह कदम अमेरिका को मानवाधिकारों के सबसे बड़े उल्लंघनकर्ताओं की श्रेणी में रखता है और यह तानाशाहों और अधिनायकवादी शासनों को बढ़ावा देने वाला एक भयानक मिसाल कायम करता है। PEN अमेरिका के अनुसार, यह वापसी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मानवाधिकारों के प्रति अमेरिकी प्रतिबद्धताओं से एक मौलिक पीछे हटना है।
यह निर्णय अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार तंत्रों की प्रभावशीलता और निष्पक्षता के साथ-साथ मानवाधिकार मुद्दों पर अमेरिका के बहुपक्षीय जुड़ाव के दृष्टिकोण पर चल रही बहसों को उजागर करता है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका के इस कदम से ईरान, रूस और सूडान जैसे मानवाधिकारों का उल्लंघन करने वाले देशों को भी इसी तरह के कदम उठाने का बहाना मिल सकता है। यह अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के प्रति अमेरिका की प्रतिबद्धता और वैश्विक मानवाधिकार वकालत में उसकी भूमिका पर सवाल खड़े करता है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के प्रवक्ता ने कहा कि यह निर्णय खेदजनक है और वे अमेरिकी सरकार के साथ-साथ नागरिक समाज के साथ भी मानवाधिकार मुद्दों पर जुड़ना जारी रखेंगे। अमेरिका का यह निर्णय, जो पहले भी 2018 में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद से हटने के रूप में देखा गया था, वैश्विक मंच पर मानवाधिकारों के प्रति उसकी प्रतिबद्धता पर एक महत्वपूर्ण प्रश्नचिह्न लगाता है।
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) एक अंतर-सरकारी निकाय है जिसकी स्थापना 2006 में हुई थी, जिसका उद्देश्य दुनिया भर में मानवाधिकारों को बढ़ावा देना और उनकी रक्षा करना है। UPR, इस परिषद का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसमें सभी सदस्य देशों के मानवाधिकार रिकॉर्ड की नियमित समीक्षा की जाती है। अमेरिका ने फरवरी 2025 में एक कार्यकारी आदेश के माध्यम से UNHRC से हटने की घोषणा की, जो 2018 में की गई पिछली वापसी के समान है।
अमेरिकी विदेश विभाग के एक प्रवक्ता ने कहा कि UPR में भाग लेना परिषद के जनादेश को स्वीकार करने जैसा है, और परिषद की गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनकर्ताओं की निंदा करने में विफलता को नजरअंदाज करना है। उन्होंने चीन और क्यूबा जैसे देशों का उल्लेख किया जिन्हें वे उल्लंघनकर्ता मानते हैं। ACLU और PEN अमेरिका जैसे संगठनों ने इस कदम की आलोचना करते हुए कहा कि यह अमेरिका को मानवाधिकार उल्लंघनकर्ताओं की श्रेणी में रखता है और तानाशाही को बढ़ावा देता है।
विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका के इस कदम से अन्य देश भी इसी तरह के कदम उठा सकते हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों पर सवाल उठेंगे। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के प्रवक्ता ने इस निर्णय को खेदजनक बताया और कहा कि वे अमेरिका के साथ जुड़ना जारी रखेंगे।