ज्योतिषीय सिद्धांतों के अनुसार, व्यक्ति की जन्म-राशि में निहित स्वभावगत प्रवृत्तियाँ उनके जीवनकाल और स्वास्थ्य की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती हैं, जिससे कुछ राशियों को स्वाभाविक रूप से अधिक स्वस्थ और लंबी आयु वाला माना जाता है। यह अवधारणा इस विचार पर आधारित है कि व्यक्तित्व की स्थिरता और जीवनशैली के चुनाव सीधे तौर पर दीर्घायु को बढ़ावा देते हैं। ज्योतिष शास्त्र में, आयु का निर्धारण कुंडली में ग्रहों, भावों और योगों के जटिल विश्लेषण पर निर्भर करता है, जहाँ 75 से 100 वर्ष के बीच की आयु को 'दीर्घायु' की श्रेणी में रखा जाता है, जो औसत जीवनकाल से अधिक मानी जाती है। वैदिक शास्त्रों में भी, समग्र कल्याण के लिए मन और शरीर के सामंजस्य पर जोर दिया गया है, और यह माना जाता है कि ग्रहों की स्थिति स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के समय की भविष्यवाणी करने में मार्गदर्शन कर सकती है।
विशेष रूप से, पृथ्वी तत्व की राशियाँ—वृषभ, कन्या और मकर—को दीर्घायु के लिए अनुकूल माना जाता है क्योंकि वे जिम्मेदारी और निरंतरता जैसे गुणों का प्रदर्शन करते हैं, जो स्वास्थ्य रखरखाव और जोखिम से बचने की आदतों को पोषित करते हैं। पृथ्वी तत्व की ये तीनों राशियाँ वाक्पटु और स्थिर मानी जाती हैं, और इनका बुध ग्रह से संबंध होता है। वृषभ राशि के जातक स्थिरता और दिनचर्या को महत्व देते हैं, जिससे वे आवेगपूर्ण निर्णयों से बचते हैं और एक शांत वातावरण बनाए रखते हैं जो शारीरिक कल्याण के लिए अनुकूल है। कन्या राशि वाले अपनी स्वास्थ्य संबंधी आदतों पर सूक्ष्म ध्यान देते हैं, जिसमें आहार की बारीकियों और नियमित स्वास्थ्य जांचों का पालन करना शामिल है, जिससे वे तनाव को प्रभावी ढंग से प्रबंधित कर पाते हैं।
वहीं, मकर राशि के लोग दृढ़ता और आत्म-नियंत्रण का प्रदर्शन करते हैं, जो वित्तीय सुरक्षा और स्थिरता के प्रति उनके मूल्य को दर्शाता है, और यह आंतरिक शांति दीर्घकालिक स्वास्थ्य लाभ प्रदान करती है। मकर राशि के जातकों की स्मृति शक्ति मजबूत होती है। पृथ्वी तत्व के अलावा, कर्क राशि को भी स्थिरता से जुड़े लाभों के लिए पहचाना जाता है। कर्क राशि वाले परिचित और स्थिर घरेलू परिवेश में पनपते हैं, संघर्ष से दूर रहते हैं, और दूसरों का पोषण करने में आनंद पाते हैं, जिससे शारीरिक तनाव कम होता है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से, मन का कारक चंद्रमा होता है, जबकि योग साधना प्राण और अपानवायु का उपयोग करके मन को स्थिर करने का प्रयास करती है।
ज्योतिष शास्त्र में आयु के पांच प्रमुख वर्गों का निर्धारण होता है, जिसमें 32 वर्ष से पहले की आयु को 'अल्पायु' और 32 से 64 वर्ष की आयु को 'मध्यमायु' कहा जाता है। दीर्घायु का निर्धारण करते समय, कुंडली में आठवें भाव (जो आयु का प्रतिनिधित्व करता है) के स्वामी की शक्ति और उसमें बैठे ग्रहों की स्थिति का आकलन करना आवश्यक होता है। कृष्णमूर्ति पद्धति (KP) में, आठवें भाव के सब लॉर्ड का विश्लेषण मृत्यु के समय और कारण का अनुमान लगाने के लिए किया जाता है, और दीर्घायु का अनुमान अल्पायु (32 वर्ष से पहले), मध्यमायु (32 से 64 वर्ष), और पूर्णायु (64 वर्ष से अधिक) के स्तरों पर किया जाता है। यह भी माना जाता है कि गलत खान-पान या व्यसनों के कारण आयु योग क्षीण हो सकते हैं, इसलिए शरीर रूपी मशीन को सावधानी से चलाना महत्वपूर्ण है।




