'फाइबरमैक्सिंग' का बढ़ता चलन: आखिर क्यों प्रोटीन से ज्यादा जरूरी हो गया है फाइबर?

लेखक: Svetlana Velhush

'फाइबरमैक्सिंग' का बढ़ता चलन: आखिर क्यों प्रोटीन से ज्यादा जरूरी हो गया है फाइबर?-1

Fibermaxxing

वर्ष 2026 में, स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोगों का ध्यान मांसपेशियों के निर्माण से हटकर अब पेट के स्वास्थ्य यानी गट हेल्थ पर केंद्रित हो गया है। 'छिपा हुआ' फाइबर अब पास्ता से लेकर डेसर्ट तक, हमारे दैनिक आहार के सामान्य उत्पादों में अपनी जगह बना रहा है। चिकित्सा विशेषज्ञ अब इसे शरीर से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने के लिए एक 'मुख्य सुरक्षा कवच' के रूप में परिभाषित कर रहे हैं।

पिछले एक दशक में फिटनेस की दुनिया पूरी तरह से प्रोटीन के प्रभाव में रही है, जहाँ हर तरफ प्रोटीन बार, शेक और चिप्स का ही बोलबाला था। हालांकि, मार्च 2026 को आधिकारिक तौर पर 'फाइबर के विद्रोह' के समय के रूप में मान्यता दी गई है। 'फाइबरमैक्सिंग' (Fibermaxxing) नामक यह नया चलन दक्षिणी कैलिफोर्निया से शुरू हुआ और बहुत कम समय में वैश्विक बाजारों पर छा गया। इसका मुख्य उद्देश्य शरीर की कार्यप्रणाली को बेहतर बनाने के लिए फाइबर के सेवन को सचेत रूप से प्रतिदिन 30 से 50 ग्राम तक बढ़ाना है।

इस बदलाव के पीछे कई ठोस कारण मौजूद हैं। सबसे पहले, लोग अब अत्यधिक प्रोटीन वाले आहार के दुष्प्रभावों जैसे कि पेट फूलना, भारीपन और त्वचा की समस्याओं से परेशान हो चुके हैं। ऐसी स्थिति में फाइबर एक प्राकृतिक उपचार के रूप में सामने आया है, जो शरीर को फिर से हल्का और ऊर्जावान बनाने में मदद करता है।

दूसरा महत्वपूर्ण पहलू ऊर्जा की निरंतरता है। साधारण कार्बोहाइड्रेट और यहाँ तक कि शुद्ध प्रोटीन की तुलना में, फाइबर शरीर में शर्करा के अवशोषण की गति को धीमा कर देता है। इससे रक्त शर्करा का स्तर स्थिर रहता है और दोपहर के समय होने वाली थकान या ऊर्जा की कमी महसूस नहीं होती है, जिससे व्यक्ति पूरे दिन सक्रिय बना रहता है।

इसके साथ ही, 2026 में लोग महंगे सप्लीमेंट्स के बजाय स्वास्थ्य सुधार के किफायती तरीके ढूंढ रहे हैं, जिसे 'सुलभ बायोहैकिंग' कहा जा रहा है। साधारण दिखने वाली सब्जियाँ जैसे पत्ता गोभी, विभिन्न प्रकार की दालें और चिया बीज अब नए 'सुपरफूड' के रूप में अपनी पहचान बना चुके हैं।

खाद्य उद्योग ने भी इस उभरते हुए ट्रेंड को भांपते हुए खुद को तेजी से बदला है। अब सुपरमार्केट की अलमारियों पर कई नए और स्वास्थ्यवर्धक विकल्प दिखाई देने लगे हैं:

  • फंक्शनल पास्ता: यह पास्ता अब केवल मैदे से नहीं, बल्कि छोले, दाल और यहाँ तक कि बांस के रेशों से तैयार किया जा रहा है।
  • प्रीबायोटिक सोडा: ये ऐसे आधुनिक पेय पदार्थ हैं जिनमें चीनी की जगह प्रति कैन 5 से 10 ग्राम तक फाइबर शामिल किया गया है।
  • 'अदृश्य' फाइबर: बाजार में अब ऐसे गंधहीन और स्वादहीन पाउडर उपलब्ध हैं, जैसे रेजिस्टेंट स्टार्च या इनुलिन, जिन्हें कॉफी, दही या किसी भी पकवान में मिलाकर उसका पोषण मूल्य बढ़ाया जा सकता है।

प्यूरोलैब्स (Purolabs) की प्रमुख पोषण विशेषज्ञ स्टेफनी बेकर (Stephanie Baker) का मानना है कि अब समय बदल गया है। वह कहती हैं, "अब हम कैलोरी की गिनती छोड़कर फाइबर की मात्रा पर ध्यान दे रहे हैं। यदि आपके भोजन की थाली में कुछ भी प्राकृतिक या रेशेदार नहीं है, तो समझ लीजिए कि आपका माइक्रोबायोम भूखा रह गया है।"

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स्रोतों

  • Los Angeles Times: Репортаж о зарождении тренда Fibermaxxing в Калифорнии

  • ScienceDaily: Исследование о том, как клетчатка трансформирует здоровье кишечника.

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