
अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों पर वैश्विक नियामक कार्रवाई और भारत में खपत में वृद्धि
द्वारा संपादित: Olga Samsonova

दुनिया भर में, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों (UPFs) के सेवन को लेकर स्वास्थ्य संबंधी चेतावनियाँ तेज़ी से बढ़ रही हैं, क्योंकि ये औद्योगिक रूप से अत्यधिक संसाधित उत्पाद पुरानी बीमारियों के प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। इन उत्पादों में अक्सर कृत्रिम स्वाद, रंग और परिरक्षक शामिल होते हैं, और ये मोटापा, हृदय रोग और मधुमेह जैसी स्थितियों से जुड़े हुए हैं। इस बढ़ते जनस्वास्थ्य संकट के जवाब में, विभिन्न राष्ट्र नियामक हस्तक्षेपों को तेज़ कर रहे हैं, भले ही इन उत्पादों की सटीक परिभाषा पर बहस जारी है।
यूनाइटेड किंगडम ने 5 जनवरी 2026 से इस दिशा में एक निर्णायक कदम उठाया है, जहाँ जंक फूड के ऑनलाइन विज्ञापनों पर पूर्ण प्रतिबंध और टेलीविजन पर रात 9 बजे से पहले उनके प्रसारण पर सख्त रोक लागू की गई है। स्वास्थ्य एवं सामाजिक देखभाल विभाग (DHSC) का अनुमान है कि इस प्रतिबंध से बच्चों के आहार से सालाना लगभग 7.2 अरब कैलोरी कम हो सकती है, जिससे मोटापे के लगभग 20,000 मामलों को रोकने में सहायता मिलेगी और नेशनल हेल्थ सर्विस (NHS) पर दीर्घकालिक दबाव कम होगा। ब्रिटेन की स्वास्थ्य मंत्री एशले डाल्टन ने इस कदम को बच्चों को अस्वास्थ्यकर खाद्य पदार्थों के अत्यधिक संपर्क से बचाने और माता-पिता के लिए स्वस्थ विकल्प चुनना आसान बनाने के प्रयास के रूप में रेखांकित किया। यह नीति यूके में बचपन के मोटापे की गंभीर दर को संबोधित करती है, जहाँ प्राथमिक विद्यालय शुरू करने वाले 22.1 प्रतिशत बच्चे अधिक वजन या मोटापे से ग्रस्त होते हैं।
संयुक्त राज्य अमेरिका में भी इसी तरह की चिंताएँ मुखर हो रही हैं, जहाँ 2025-2030 के लिए आहार संबंधी दिशानिर्देशों में अत्यधिक प्रसंस्कृत वस्तुओं को सीमित करने की स्पष्ट सलाह दी गई है। ये दिशानिर्देश, जो स्कूल भोजन जैसे संघीय पोषण कार्यक्रमों को प्रभावित करते हैं, विशेष रूप से चार वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए शून्य अतिरिक्त शर्करा की सिफारिश करते हैं। अमेरिकी कृषि विभाग (USDA) और स्वास्थ्य एवं मानव सेवा विभाग द्वारा जारी इन दिशानिर्देशों में प्रोटीन को केंद्र में रखने और साबुत, पोषक तत्वों से भरपूर खाद्य पदार्थों पर जोर देने पर भी ध्यान केंद्रित किया गया है। उल्लेखनीय है कि इन नए अमेरिकी दिशानिर्देशों ने शराब की खपत पर पूर्व की विशिष्ट सीमा सिफारिशों को हटा दिया है, अब केवल कम सेवन की सलाह दी गई है, जबकि प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों से बचने पर जोर कायम है।
वैश्विक स्तर पर, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों के आक्रामक विपणन और कमजोर विनियमन को उनके बढ़ते उपभोग के लिए उत्तरदायी कारक माना जाता है, जैसा कि लैंसेट रिपोर्ट में उजागर किया गया है। इन उत्पादों को अक्सर अत्यधिक स्वादिष्ट बनाने और लंबी शेल्फ लाइफ के लिए डिज़ाइन किया जाता है, जिससे वे आधुनिक जीवनशैली का एक अभिन्न अंग बन गए हैं। उदाहरण के लिए, भारत में 2006 से 2019 के बीच UPF की खुदरा बिक्री में लगभग 40 गुना वृद्धि देखी गई है, जो इसी अवधि में वयस्क मोटापे के लगभग दोगुना होने के साथ जुड़ी हुई है। विशेषज्ञों का मत है कि केवल उपभोक्ता व्यवहार में बदलाव से इस प्रवृत्ति को पलटा नहीं जा सकता; इसके लिए उत्पादन और वितरण को नियंत्रित करने वाली नई नीतियों का विकास आवश्यक है। इस प्रकार, यूके और यूएसए जैसे प्रमुख बाजारों में नियामक कार्रवाई का यह त्वरण एक व्यापक वैश्विक रणनीति का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य सार्वजनिक स्वास्थ्य को मजबूत करना और पुरानी बीमारियों के बोझ को कम करना है।
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स्रोतों
Corriere della Sera
JD Supra
ASTHO
The Guardian
GOV.UK
EdNC
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