लगभग 470 मिलियन वर्ष पहले, ओर्डोविशियन युग के दौरान, पृथ्वी के इतिहास में एक क्रांतिकारी बदलाव आया। यह वह समय था जब शैवाल से विकसित हुए शुरुआती पौधों ने पहली बार जलीय वातावरण को छोड़कर सूखी भूमि पर अपने कदम रखे। इन शुरुआती जीवों ने पानी और हवा के बीच की बदलती परिस्थितियों में खुद को ढालकर एक जटिल जैवमंडल की नींव रखी। यूनिवर्सिटी ऑफ एक्सेटर के वैज्ञानिकों ने कंप्यूटर मॉडलिंग के माध्यम से यह निष्कर्ष निकाला है कि ये शुरुआती भूमिज पौधे, जो आज के काई (mosses) के समान थे, अत्यंत उत्पादक थे और उन्होंने पृथ्वी के वायुमंडल में ऑक्सीजन के स्तर को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
पानी से जमीन पर आने के इस कठिन सफर के लिए इन पौधों को विशेष शारीरिक बदलावों की आवश्यकता थी। सबसे महत्वपूर्ण नवाचार एक मोमी परत यानी 'क्यूटिकल' का विकास था, जिसने पौधों के भीतर नमी बनाए रखने और उन्हें सूखने से बचाने में मदद की। इसके अलावा, जमीन पर खुद को स्थिर करने और पोषक तत्वों को सोखने के लिए 'राइजोइड्स' (तंतुमय संरचनाएं) विकसित हुए। हालांकि, उस समय इनमें ऊर्ध्वाधर सहारे के लिए विकसित यांत्रिक ऊतकों की कमी थी, इसलिए ये राइजोइड्स मुख्य रूप से जड़ों के बजाय केवल पकड़ बनाने का काम करते थे।
इन शुरुआती पौधों का पृथ्वी की भू-रासायनिक प्रक्रियाओं पर गहरा प्रभाव पड़ा। जैसे-जैसे इन आदिम पौधों ने नग्न चट्टानों पर अपनी पकड़ बनाई, उनकी संरचनाओं ने खनिजों के क्षरण (weathering) की प्रक्रिया को तेज कर दिया। इस प्रक्रिया के परिणामस्वरूप पृथ्वी पर पहली उपजाऊ मिट्टी का निर्माण शुरू हुआ। इसके साथ ही, उनकी निरंतर प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) की गतिविधि ने वायुमंडल को ऑक्सीजन से समृद्ध करना शुरू कर दिया, जिससे भविष्य में जटिल जंतु जीवन के विकास के लिए आवश्यक परिस्थितियां तैयार हुईं।
चीनी विज्ञान अकादमी के भूविज्ञान और भूभौतिकी संस्थान के शोधकर्ताओं द्वारा समुद्री तलछटों के अध्ययन से भी इस प्रक्रिया की पुष्टि होती है। लगभग 455 मिलियन वर्ष पहले कार्बन और फास्फोरस के अनुपात में अचानक हुई वृद्धि यह दर्शाती है कि उस समय तक स्थलीय वनस्पतियों का विस्तार बड़े पैमाने पर हो चुका था। इसके बाद, लगभग 420 मिलियन वर्ष पहले सिलुरियन काल के अंत तक, पौधों में संवहनी ऊतकों (vascular tissues) का विकास हुआ। इस विकास ने पौधों को आकार में बड़ा होने और विशाल जंगलों का रूप लेने में सक्षम बनाया।
इन प्राचीन वृक्षों के अवशेष जब दलदली पारिस्थितिकी तंत्र की ऑक्सीजन-रहित परिस्थितियों में दबे, तो उन्होंने आधुनिक कोयला भंडारों के निर्माण की भूवैज्ञानिक नींव रखी। कोयला बनने की यह सक्रिय प्रक्रिया मुख्य रूप से कार्बोनिफेरस काल के दौरान हुई, जो लगभग 350 मिलियन वर्ष पहले शुरू हुआ था। इस प्रकार, शैवाल का भूमि की ओर पलायन केवल एक जैविक घटना नहीं थी, बल्कि इसने वैश्विक बदलावों की एक श्रृंखला शुरू की, जिसमें कार्बन चक्र का पुनर्गठन और 400-420 मिलियन वर्ष पहले तक आधुनिक स्तर के करीब ऑक्सीजन की उपलब्धता शामिल थी।


